बांग्लादेश में ‘भीड़तंत्र’ का खूनी तांडव: हादी की मौत, जलते मीडिया हाउस और एक पत्रकार की आखिरी चीख – “सांस नहीं ले पा रही हूं…”

Javed Akhtar - संस्थापक- ख़बर हिंदी
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फोटो-AI
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लोकतंत्र की राख और पत्रकार की आखिरी चीख

“सांस नहीं ले पा रही हूं…” ढाका की एक जलती हुई बहुमंजिला इमारत के भीतर से आई एक महिला पत्रकार की यह आखिरी चीख महज तीन शब्द नहीं, बल्कि आज के बांग्लादेश की उस खौफनाक हकीकत का दस्तावेज है. जो दुनिया को यह बताने के लिए काफी है कि हमारा पड़ोसी मुल्क अब लोकतंत्र की दहलीज लांघकर ‘भीड़तंत्र’ के उस अंधेरे कुएं में गिर चुका है.

जहां तर्क कानून और संविधान की जगह सिर्फ आग, धुएं और प्रतिशोध का राज है पिछले 24 घंटों में बांग्लादेश की राजधानी ढाका का मंजर किसी गृहयुद्ध से कम नहीं रहा है. जहां आसमान में धुएं के काले गुबार और सड़कों पर दौड़ती उन्मादी भीड़ ने कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी हैं और इस पूरे बवाल के केंद्र में है एक नाम है.

वह चिंगारी जिसने ढाका को जला दिया

हादी वह छात्र नेता जिसे ‘भेदभाव विरोधी छात्र आंदोलन’ का एक प्रमुख चेहरा और अगस्त की क्रांति का नायक माना जाता था. लेकिन उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने उस बारूद में चिंगारी लगा दी है जो पिछले कई महीनों से ढाका की सड़कों के नीचे सुलग रहा था. हादी की मौत की खबर फैलते ही उसके समर्थकों ने पुलिस हिरासत में हत्या या विरोधी गुटों की साजिश करार देते हुए ‘शहादत’ का नाम दिया.

हजारों की तादाद में छात्र और उपद्रवी सड़कों पर उतर आए, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उनका निशाना सरकारी इमारतें या पुलिस थाने नहीं बल्कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यानी ‘मीडिया’ बना. प्रदर्शनकारी छात्रों के मन में यह धारणा उत्पन्नत हो गई है कि बांग्लादेशी मीडिया उनकी ‘सच्ची आवाज’ को दबा रहा है और वह या तो भारत के प्रभाव में है या फिर पुरानी शेख हसीना सरकार का वफादार बनकर रह गया है.

हिंदू युवक की लिंचिंग

यह दिल दहला देने वाली वारदात मयमनसिंह के भालुका उपजिला (Bhaluka Upazila) के दुबालिया पारा इलाके में घटी। मृतक की पहचान दीपू चंद्र दास के रूप में हुई, जो एक स्थानीय गारमेंट फैक्ट्री में काम करता था। रिपोर्ट्स के अनुसार गुरुवार की रात एक विशेष समुदाय की भीड़ ने दीपू को घेर लिया। उन पर पैगंबर मोहम्मद के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी (ईशनिंदा) करने का आरोप लगाया गया।

प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भीड़ ने कानून को अपने हाथ में लेते हुए दीपू को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। जब वह अधमरा हो गया, तो उसे छोड़ा नहीं गया बल्कि उसकी हत्या कर दी गई। दरिंदगी यहीं नहीं रुकी; उन्मादी भीड़ ने उसके शव को एक पेड़ से लटकाया और आग लगा दी। इस दृश्य ने वहां मौजूद हर संवेदनशील व्यक्ति की रूह कंपा दी।

चौथे स्तंभ’ का दमन और अग्निशमन का रास्ता रोकती भीड़

जिसे अब वो ‘देश का दुश्मन’ मानते हैं और इसी नफरत की आग में ढाका के दो सबसे बड़े मीडिया हाउसों को भीड़ ने घेर लिया और पेट्रोल बमों से हमला कर दिया, जिससे दफ्तरों के भीतर काम कर रहे सैकड़ों पत्रकार, एंकर, कैमरापर्सन और तकनीकी कर्मचारी आग की लपटों के बीच घिर गए, स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब इमारतें धू-धू कर जल रही थीं और अंदर फंसे लोग धुएं से दम घुटने के कारण बेहोश हो रहे.

तब बाहर खड़ी भीड़ जश्न मना रही थी और आग बुझाने के लिए आ रही दमकल की गाड़ियों को रस्सियों, ईंट-पत्थरों और बैरिकेड्स लगाकर रोका जा रहा था जो यह साबित करता है कि यह हमला सिर्फ विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह एक सुनियोजित प्रयास था कि दुनिया तक बांग्लादेश की बदहाली की तस्वीरें न पहुंच सकें और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट दिया जाए. यह पूरा घटनाक्रम नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की पूर्ण विफलता का एक और जीवंत प्रमाण है.

वर्दीधारी गायब और सड़कों पर ‘जज’ बनी उन्मादी भीड़

अगस्त 2024 की क्रांति के बाद बड़े-बड़े वादों के साथ सत्ता में आई थी, लेकिन आज हालात यह हैं कि पुलिस का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है, वर्दीधारी सड़कों से गायब हैं और न्याय का फैसला अदालतें नहीं बल्कि सड़कों पर खड़ी भीड़ कर रही है, जिसे जो ‘दोषी’ लगता है, उसे वहीं सजा दे दी जाती है.जिसके चलते राजधानी में भय का माहौल है और आम आदमी अपने घरों में कैद होने को मजबूर है.

इसके अलावा हादी की मौत ने छात्र संगठनों के भीतर चल रही उस गुटबाजी को भी सतह पर ला दिया है जो अब तक छिपी हुई थी, क्योंकि क्रांति के बाद छात्र आंदोलन अब एक इकाई नहीं रहा बल्कि उसमें कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों, जैसे जमात-ए-इस्लामी, और सेक्युलर गुटों के बीच वर्चस्व की खूनी लड़ाई शुरू हो चुकी है. और हादी शायद इसी आंतरिक कलह का शिकार हुआ. लेकिन उसकी मौत का इस्तेमाल देश में अराजकता फैलाने के लिए किया गया.

आंतरिक कलह, कट्टरपंथ और दक्षिण एशिया के लिए खतरे की घंटी

चरमराती अर्थव्यवस्था, आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी और बिजली संकट से हताश जनता का गुस्सा भी अब हिंसक रूप ले रहा है, जिससे यह साफ है कि बांग्लादेश अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है जहां असहमति का मतलब मौत है और अगर इसे नहीं रोका गया तो यह आग सिर्फ ढाका तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए खतरा बन जाएगी क्योंकि जब एक देश में कानून मरता है और भीड़ ही जज जूरी और जल्लाद बन जाती है, तो वहां से सिर्फ चीखें ही सुनाई देती हैं बिल्कुल वैसी ही, जैसी उस जलते हुए मीडिया दफ्तर से आई थी।

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मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन विषय के साथ पोस्ट ग्रेजुएट, लगभग 4 वर्षो से लिखने और स्वतंत्र पत्रकारिता करने का अभ्यास, घूमने का शौक कुछ अलग करने का साहस बातचीत के लिए इंस्टाग्राम.
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