देश की आजादी के नायक थे अब्दुल खालिक खां : राम बहादुर

A R Usmani
A R Usmani - सम्पादक- ख़बर हिंदी
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महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के सम्मान में बना गांव का प्रवेश द्वारा
पूर्व जिलाधिकारी ने किया लोकार्पण, लोगों की आंखें हुईं नम

अपना लहू बहा कर देश को आज़ाद कराया

गोण्डा स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे क्रान्तिकारी वीर थे, जिन्होंने अपना तन-मन-धन सब न्योछावर कर भारत को आज़ाद कराने में अहम भूमिका निभाई। ऐसे क्रांतिवीरों का नाम देश की आज़ादी के लिए स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। भारत की आजादी के लिए क्रांतिवीरों द्वारा समय-समय पर अनेकों आंदोलन किये गए।

आजादी की खातिर जेल की यातनाएं सही और इन्हीं स्वतंत्रता सेनानियों की बदौलत 15 अगस्त 1947 को हमारा देश भारत आज़ाद हुआ, जिसके लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना लहू बहाया है और अपनी वीरता का परिचय दिया है।

आजाद हिंद फौज के सिपाही थेअब्दुल खालिक खां

इन्हीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में एक नाम अब्दुल खालिक खां का भी है, जो जंगे आजादी में एक क्रान्तिकारी सिपाही होने के साथ-साथ गंगा जमुनी तहजीब के अलम्बरदार, एक विद्वान समाज सुधारक और मानवता की मिशाल थे। इनका जन्म 1 जून 1921 को उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले के हलधरमऊ मैजापुर के मुख्तारगंज गांव में हुआ था।

राष्ट्र सेवा व समाज सेवा के दौरान 3 मार्च 1994 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। अब्दुल खालिक खां अंग्रेजी फौज में रंगून (मियांमार) में तैनात थे। 1944 में जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोष रंगून पहुंचे और भारतीयों से अंग्रेजी फौज से विद्रोह का आवाहन किया तो अब्दुल खालिक खां अंग्रेजी फौज से विद्रोह कर आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए और आजादी मिलने तक संघर्ष करते रहे।

देश आजाद होने के बाद वह अपने गांव वापस चले आए। आजादी मिलने के बाद अब्दुल खालिक खां ने मैजापुर में कारखाने लगाये और कारोबार में हाथ आजमाया। उसके बाद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी आपसी भाईचारा एवं सदभाव बढ़ाने व इंसानियत की भलाई को समर्पित कर दिया। अब्दुल खालिक खां स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ ही हिन्दू-मुस्लिम दोनों धर्मों की पुस्तकों के ज्ञाता थे।

राष्ट्रपति भवन से जारी पत्र महफूज है

देश और दुनिया को जानने तथा देश-दुनिय में घट रहे घटना क्रम की जानकारी की बड़ी उत्सुकता रहती थी और उस पर नजर भी रखते थे तथा अपनी प्रतिक्रिया भी देते थे। राष्ट्रपति जाकिर हुसैन से उनके बहुत ही अच्छे रिश्ते थे। आज भी उनके द्वारा हाथ से लिखे खत जो राष्ट्रपति भवन से जारी होते थे, वह महफूज रखे हैं।

उन्होंने देश के लगभग हिस्से का दौरा किया। कश्मीर उनकी पसंदीदा जगह थी। मिडिल ईस्ट के लगभग सभी अरब देशों, मिस्र, ईरान, ईराक, सीरिया, सऊदी अरबिया आदि का दौरा किया और वहां के कुछ हुक्मरानों से भी मुलाकात की जिसमें मिस्र के राष्ट्रपति सदर नासिर से खत किताबत होती रहती थी।

अब्दुल खालिक के सम्मान में प्रवेश द्वारा बनाया गया

उनके हस्तलिखित खत आज भी मौजूद हैं। जब अमेरिका और वियतनाम के बीच युद्ध 1955-1975 नहीं रुक रहा था, तमाम इंसानी जानें जा रही थींं, तब अब्दुल खालिक ने अपने तमाम साथियों को बुलाया। प्रधान दुर्गा सिंह, पण्डित बसंतलाल, ध्रुवराज सिंह, मगन सिंह प्रधान, रऊफ बाबा आदि को बुलाया और शांति प्रस्ताव लिखा गया जिसमें सैकड़ों लोगों के दस्तखत हुए जिसकी ड्राफ्टिंग प्रधान मगन सिंह ने की थी जो आज भी जीवित हैं। इस प्रस्ताव को बजरिये डाक संयुक्त राष्ट्र संघ भेजा गया। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में उस प्रस्ताव को पढ़ा गया और संयुक्त राष्ट्र के मिनट बुक में दर्ज किया गया।
आज महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अब्दुल खालिक के सम्मान में उनके गांव हलधरमऊ मुख़्तारगंज गांव पर एक भव्य प्रवेश द्वारा बनाया गया जिसका लोकार्पण उनके पौत्र मसूद आलम खां व पूर्व जिलाधिकारी (सेवानिवृत्त) राम बहादुर व डॉ मोहम्मद सादिर खां ने किया। इस मौके पर उनके साथ आजादी की जंग लड़ने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम अचल दूबे, मगन सिंह प्रधान सहित सैकड़ों लोग मौजूद थे।

प्रवेश द्वार का उद्धघाटन पौत्र पुत्र मसूद आलम खां ने किया

पूर्व जिलाधिकारी राम बहादुर ने कहा कि 2011 के बाद एक ऐसा कार्यक्रम था जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के लिए जो सम्मान दिया गया उससे मेरा सर ऊँचा हो गया। इस मौके पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के पौत्र मसूद आलम खान ने कहा कि तन मन धन और परिवार को त्याग कर दादा जी का आजादी के लिए जंग लड़ना और तब तक लड़ते रहना जब तक देश आजाद नहीं हो गया, यह हमारे लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात है।

आजादी के बाद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी आपसी भाईचारा, सदभाव बढ़ाने व इंसानियत की भलाई के नाम पर समर्पित कर दी। यही हम लोगों के प्रेरणा हैं, जिसे हम सभी आत्मसात करते हैं। इस मौके पर गंगा जमुनी तहजीब को आगे बढ़ाते हुए डॉ सादिर खां, मसूद आलम खां और पूर्व जिलाधिकारी राम बहादुर ने शहीद के परिवारों को सम्मानित किया। साथ ही सैकड़ों गरीबों, असहयों को होली का उपहार देकर उन्हें भी सम्मानित किया गया।

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सम्पादक- ख़बर हिंदी
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सम्पादक- ख़बर हिंदी बचपन से ही पत्रकारिता का शौक था। मीडिया जैसे हथियार से समाज के दबे-कुचले, पिछड़े, शोषित, पीड़ित लोगों की मदद करने का जज्बा था जो अब भी बरकरार है। शुरूआत से ही सच लिखने का शौक़ था और जुनून भी। पीत पत्रकारिता करने वालों से घृणा है। नामचीन पत्रकारों के लेख मैं आज भी पढ़ता हूं। मकसद सिर्फ मिशन पत्रकारिता है। भारत के कई प्रिंट मीडिया संस्थानों में 25 वर्षों का योगदान रहा।
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