Gonda: डीएम साहब! बनकटी सूर्यबली सिंह में आंगनबाड़ी केंद्र के बच्चों व महिलाओं को तीन महीने से नहीं मिला खाद्यान्न

A R Usmani
A R Usmani - सम्पादक- ख़बर हिंदी
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0 हजार से ज्यादा बच्चों और महिलाओं को नहीं मिला खाद्यान्न

गोण्डा। आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को प्री-प्राइमरी की शिक्षा देने के लिए व्यवस्थाएं बेहतर करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन हालत सुधरती नहीं दिख रही है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर स्थिति यह है कि 50 हजार से ज्यादा बच्चों और महिलाओं को हर महीने खाद्यान्न ही नहीं मिल रहा है।

सबसे ज्यादा खराब स्थिति छह माह से तीन साल तक के बच्चों के लिए है। यहां आधे ही बच्चों को खाद्यान्न मिल पाता है। यह किसी एक ब्लाक अथवा जिले की हालत नहीं है, बल्कि आईजीआरएस पोर्टल पर प्रदेश के सभी जिलों से सबसे ज्यादा खाद्यान्न पूरा नहीं मिलने की शिकायतें पहुंच रही हैं।

जिले के मुजेहना ब्लॉक की ग्राम पंचायत बनकटी सूर्यबली सिंह में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र द्वारा खाद्यान्न वितरण न करने की शिकायतें लगातार जिम्मेदारों से की जाती रही हैं. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

नौनिहालों के हिस्से का खाद्यान्न डकार रहे जिम्मेदार

आरोप है कि यहां की आंगनबाड़ी कार्यकत्री शीला देवी द्वारा अक्टूबर 2022 में खाद्यान्न का वितरण किया गया था। उसके बाद से अब फरवरी माह में जब वितरित किया जाने लगा तो तमाम ग्रामीणों द्वारा विरोध करते हुए खाद्यान्न लेने से इंकार कर दिया गया।

ग्रामीणों का कहना है कि यहां तीन-तीन महीने का नौनिहालों व महिलाओं के हिस्से का खाद्यान्न आंगनबाड़ी कार्यकत्री व अन्य जिम्मेदारों द्वारा डकार लिया जाता है।

इसकी शिकायत करने पर भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती है जिससे आंगनबाड़ी कार्यकत्री के साथ ही अन्य जिम्मेदारों के हौंसले बुलंद हैं।

ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से जांच कराकर नौनिहालों व महिलाओं को उनके हिस्से का खाद्यान्न प्रत्येक महीने वितरित कराने की मांग की है।

महिला एवं बाल विकास विभाग ने खाद्यान्न के लिए तीन वर्ग बनाए

बताते चलें कि महिला एवं बाल विकास विभाग ने खाद्यान्न के लिए तीन वर्ग बनाए हैं। इनमें एक वर्ग छह महीने से तीन साल वाले बच्चों के लिए होता है. जिसमें डेढ़ किलो गेहूं, एक किलो चावल, एक किलो दाल, आधा किलो तेल दिया जाता है।

दूसरा वर्ग 3-6 साल के बच्चों के लिए होता है, जिनके लिए आधा किलो दाल, आधा किलो गेहूं, एक किलो चावल मिलता है। तीसरे वर्ग में गर्भवती महिलाएं व चौथे वर्ग में धात्री महिलाएं होती हैं, जिनको हर महीने एक किलो दाल, डेढ़ किलो गेहूं, एक किलो चावल व आधा किलो तेल देना होता है।

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सम्पादक- ख़बर हिंदी बचपन से ही पत्रकारिता का शौक था। मीडिया जैसे हथियार से समाज के दबे-कुचले, पिछड़े, शोषित, पीड़ित लोगों की मदद करने का जज्बा था जो अब भी बरकरार है। शुरूआत से ही सच लिखने का शौक़ था और जुनून भी। पीत पत्रकारिता करने वालों से घृणा है। नामचीन पत्रकारों के लेख मैं आज भी पढ़ता हूं। मकसद सिर्फ मिशन पत्रकारिता है। भारत के कई प्रिंट मीडिया संस्थानों में 25 वर्षों का योगदान रहा।
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